कलाम की आत्मकथा

 : 1 :

ऊँ चा और विशाल अर्जुन का पेड़ और उसके नीचे बैठा मैं—धीर-गंभीर, शांतचित्त! मेरी निगाहें अपने बगीचे में दूर तक फैली हरियाली देख रही हैं। भोर की शुद्ध हवा को मैं अपनी श्वासों से भीतर-बाहर आता-जाता हुआ महसूस कर रहा हूँ। यह प्राणवायु मेरे तन और मन को असीम आनंद से भर रही है। तभी नन्ही गौरैयों के चहचहाने की मद्धिम-मद्धिम आवाज मेरे कानों के भीतर पहुँचती है और मैं आत्मविभोर होता हुआ धीरे-धीरे अपने और भीतर उतरने लगता हूँ—और भीतर और भीतर। खुद-ब-खुद मेरी दोनों आँखें बंद हो रही हैं। गहरी-गहरी साँसें लेते हुए मैं खुद को भीतर तक अत्यंत शीतलता और पवित्रता से भरा हुआ महसूस कर रहा हूँ। यों लग रहा है मानो उस परम शक्ति के साथ आत्मलीन होता जा रहा हूँ, उसी में समा रहा हूँ। ये अद्भुत क्षण हैं—आनंद से भरे हुए। 

कुछ समय बाद परम आनंद के ये क्षण कुछ शिथिल पड़ते हैं और मेरे जीवन की मधुर स्मृतियों की लहरें मेरे मन-मस्तिष्क पर छाने लगती हैं। 

ऐसा लग रहा है मानो इस अर्जुन वृक्ष के नीचे आते ही मैं फिर वही छोटा सा अब्दुल बन गया हूँ, जो रोज अपने अब्बू के साथ नमाज पढ़ता था। उनकी उँगली थामे उनके साथ बातें करता हुआ चलता था या कदाचित् एक बालक अपने पिता से जीवन के गंभीर अनुभव सीखा करता था। इस अर्जुन वृक्ष की विराटता मुझे मेरे पिता की याद दिलाती है, मुझे उनके बेहद करीब पहुँचा देती है। 

मैं आँखें बंद किए बैठा हूँ और जीवन के इस अंतिम पड़ाव पर अपने बचपन की उन मीठी-मीठी यादों को महसूस कर रहा हूँ। सहसा ठंडी-ठंडी मधुर बयार चल पड़ी और मेरे बालों को, मेरे गालों को यों सहलाने लगी मानो मेरी माँ मुझे दुलार रही हों। मेरे कानों में माँ के मधुर स्वर गूँजने लगे— 

‘अब्दुल! अब्दुल!’ 

मैं उसी तरह से अर्जुन के पेड़ के नीचे बैठा मंद-मंद मुसकरा रहा हूँ, अपनी माँ के कोमल स्पर्श को महसूस कर रहा हूँ। तभी मेरे कानों में कुछ और स्वर भी उभरने लगते हैं, मिले-जुले से स्वर। 

‘अब्दुल! अब्दुल! कलाम...कलाऽऽम ऽऽऽ...कलाऽऽम ऽऽऽ...लौट आओ कलाम...तुम लौट आओ...’ 

कई स्वर आपस में घुल-मिलकर मुझे पुकार रहे हैं और मैं अब भी यों ही आँखें बंद कर बैठा हुआ हूँ।

‘‘कलाम! लौट आओ...कलाम! तुम वापस आ जाओ।’’

मैं अपनी आँखों को बिना खोले उस विशाल वृक्ष के नीचे बैठा चारों ओर से खुद को घेरती इन आत्मीय आवाजों को सुन रहा हूँ; लेकिन ये आवाजें मेरी तंद्रा को भंग कर रही हैं। ये मेरे अपनों की आवाजें हैं। मैं वैसे ही आँखें मीचे-मीचे इन आवाजों को पहचानने की कोशिश करने लगता हूँ।

‘‘कलाम!...लौट आओ, कलाम!’’

ये सब मुझसे लौट आने की फरियाद क्यों कर रहे हैं? मैं दूर गया ही कहाँ हूँ। यहीं तो हूँ, सबके पास। आवाजें लगातार उभर रही हैं। मैं सुन रहा हूँ, एक-एक स्वर पहचान रहा हूँ। सहसा एक और आवाज उभरी, ‘‘आजाद!’’ 

मेरी बंद आँखों में मेरे दोस्त, मेरे मार्गदर्शक, मेरे जीजा जलालुद्दीन का चेहरा तैर गया। वे मुझे इसी नाम से पुकारते थे। एक नरम हवा का झोंका मुझे फिर से आकर सहलाने लगा।

‘‘अब्दुल बेटा! उठो मेरे बच्चे, सुबह हो गई है।’’ ज्यों ही मेरे कानों में माँ की यह मीठी आवाज पड़ी, ऐसा लगा मानो समुद्र की लहरें भी भोर का मीठा गीत गाने लगी हैं। एकाएक मेरी श्वासों में रामेश्वरम की दैवी वायु का प्रवेश हुआ और मैं धनुषकोडि के अपने प्यारे से घर की स्मृतियों में खो गया।

‘‘उठ जा, बेटा।’’ मेरी माँ ने मुझे पुचकारते हुए कहा।

‘‘अम्मा, थोड़ी देर और सोने दो न!’’ मैं जैसे मनुहार करते हुए बोला।

‘‘न, मेरे राजा बेटा! तुझे तो खूब पढ़ना है न! तू तो मेरा होशियार बच्चा है।’’ माँ ने प्यार से मेरी दोनों पलकों को चूम लिया। मैं झटपट बिस्तर से उठा और दालान में आकर बैठ गया। सोचने लगा, ‘माँ ठीक ही तो कह रही है। मुझे पढ़ना है, सोना नहीं है।’

अब तक मेरे पिता भी जाग चुके थे। वे रोज सुबह चार बजे ही जाग जाते। मेरे पिताजी बेहद शांत और धार्मिक स्वभाव के थे। मैंने देखा कि वे दालान में एक पेड़ के नीचे शांत भाव से बैठे हैं, शायद खुदा का ध्यान कर रहे हैं। सुबह की सात्त्विक ऊर्जा मेरे पिताजी के व्यक्तित्व को और शीतल बना रही थी। ऐसा लग रहा था मानो वे खुद ही अपनी प्रार्थना को शांत भाव से सुन रहे हों। मैं एकटक उनकी ओर देख रहा था और वे अपनी आँखें बंद किए खुदा के असीम आनंद में डूबे हुए थे। 

एकाएक उन्होंने अपनी आँखें खोलीं और मेरी ओर देखकर मुसकरा दिए। फिर प्यार से बोले, ‘‘अबुल! नहा ले, बेटा। देख, तेरी अम्मा तेरे नहाने के लिए पानी भी ले आई हैं।’’

‘‘जी अब्बू।’’

मेरे पिताजी मुझे ‘अबुल’ कहकर पुकारा करते थे। वे रोज मुझे अपने साथ मसजिद लेकर जाते थे। यों तो हमारा रामेश्वरम शिव मंदिर के लिए दूर-दूर तक विख्यात था, लेकिन वहाँ पर एक मसजिद और चर्च भी थे। मेरे पिताजी उस मसजिद के इमाम थे। 

मैं अपने पिता का हाथ थामे मसजिद के भीतर पहुँचा और देखा कि सभी लोग बड़ी आस्था से सुबह की नमाज अता कर रहे हैं। मैं भी बिल्कुल वैसे-वैसे करने लगा जैसे पिताजी और अन्य लोग कर रहे थे। मैंने एहसास किया कि खुदा का नूर मेरे भीतर रूहानी ताकत बनकर उतर रहा है। 

हम ज्यों ही मसजिद से बाहर निकले, कुछ लोगों ने मेरे पिताजी को घेर लिया।

‘‘इमाम साहब! मेरे बच्चे को देखिए, बीमार है। दिन-पर-दिन कमजोर भी होता जा रहा है। आप पर तो खुदा का करम है। आप अपनी नजर-ए-इनायत बख्शेंगे तो मेरा बच्चा बच जाएगा।’’

‘‘इमाम साहब! मेरी तकलीफ बरदाश्त के बाहर हो गई है। करम करें, हुजूर।’’

‘‘साहब, अगर आप अपनी पाक उँगलियाँ इस कटोरे के पानी में छुआ दें तो मेरा सुहाग बच जाएगा। आप तो ऊपरवाले के अजीज हैं। आप फरिश्ते हैं।’’

लोगबाग मेरे पिताजी को घेर लेते और मैं उनके प्रति लोगों की आस्था को विस्मित होकर देखता रहता। पिताजी सब लोगों की बातें एक-एक कर ध्यान से सुनते और उनके कटोरों के पानी में अपनी उँगलियों के पोर डाल देते। फिर आँखें बंद करके कुछ देर तक मन-ही-मन कुछ बुदबुदाते। ये दुखियारे लोग वह पानी ले जाकर अपने-अपने लोगों को पिला देते थे। उनके चेहरों से यह अटूट विश्वास झलकता था कि मेरे अब्बू के छू लेने से वह पानी औषधि बन जाता है और अब इस पानी को पीकर उनके अपने जरूर ठीक हो जाएँगे। 

...लेकिन उस समय मुझ जैसे बालक के लिए यह सब एक अनोखे रहस्य के समान होता था। 

यह मसजिद मेरे पिताजी के जीवन का केंद्र-बिंदु थी। वे रोज नियम से वहाँ नमाज अता करने जाते और यही जिम्मेदारी का भाव वे मेरे भीतर भी भर देना चाहते थे। वे चाहते थे कि मैं भी एक धर्मपरायण और भले इनसान के रूप में बड़ा होऊँ, अपनी जिम्मेदारियों को समझूँ और सबके हित के बारे में सोचूँ। मैं सबसे प्रेम करूँ और मानवता को ही सर्वोपरि मानूँ। 

इसके बाद मैं और पिताजी नारियल के अपने बाग की ओर चल देते। यह हमारे रोज का रास्ता था। वे मिलने-जुलनेवाले लोगों के साथ दुआ-सलाम भी करते जाते और मेरा हाथ थामे बड़ी सहजता से मेरे प्रश्नों के उत्तर भी देते जाते।

‘‘अब्बू, ये लोग आपसे फरियाद क्यों करते हैं?’’

‘‘अबुल बेटा, इनसान दुःख-तकलीफ में खुदा या खुदा के अजीज बंदों को ही पुकारता है।’’

‘‘...तो क्या आप खुदा के अजीज हैं, उन्हें जानते हैं?’’

‘‘खुदा के अजीज तो हम सभी हैं, तुम भी हो। वह हम सभी के भीतर है, अबुल!’’

मैं हैरान होकर उनके चेहरे की तरफ देखता और वे मुझे देखकर मुसकरा देते। मेरे पिता बहुत अधिक पढ़े-लिखे नहीं थे, न ही उनके पास बहुत अधिक धन-दौलत थी; लेकिन वे बहुत भले इनसान थे। उन्हें धार्मिक बातों का बहुत ज्ञान था। मैंने देखा था कि लोगों का दुःख-दर्द वे दिल से महसूस करते थे। इसलिए लोग उनकी नरमदिली और सज्जनता के कारण उनकी ओर खिंचे चले आते थे। हमारे उस छोटे से शहर का हर इनसान, चाहे वह जिस भी धर्म का हो, मेरे पिता से सलाह-मशविरा जरूर करता। सच बात तो यह है कि हम में से कोई भी वहाँ जात-पाँत और भेदभाव को जानता ही न था। लोग दुःख-तकलीफ में पिताजी से प्रार्थना करते, क्योंकि लोगों का विश्वास था कि मेरे पिताजी की फरियाद खुदा स्वयं सुनता है।

‘‘ये जो लोग इतने विश्वास के साथ आपके पास आते हैं, आप इनकी मदद के लिए क्या करते हैं?’’

‘‘बेटा, जब भी कोई इनसान अपने आपको अकेला या तकलीफ से घिरा हुआ पाता है तो वह दूसरों से मदद की उम्मीद करने लगता है; जबकि सच तो यह है कि कोई भी परेशानी अकेले नहीं आती। वह अपने साथ समाधान भी लेकर आती है; लेकिन हमें चिंता के कारण वह समाधान नजर नहीं आ पाता। बेटा, मैं तो बस, ऐसे में एक मददगार बनकर आगे आ जाता हूँ। मैं अपनी दुआओं में खुदा से फरियाद करता हूँ कि वे नापाक ताकतों को दूर रखें।’’

‘‘अब्बू, दुआ में बहुत ताकत होती है?’’

‘‘हाँ बेटे, दुआ में बहुत ताकत होती है। यह हम सभी की जिंदगी में असर डालती है। हमारे अपनों की दुआएँ हमेशा हमारे आस-पास मँडराती हैं और गूँजती रहती हैं।’’

‘‘आप जब उनके कटोरे के पानी में अपनी उँगलियाँ डालते हैं, तब आँखें बंद करके मन-ही-मन खुदा से क्या बात करते हैं?’’ मैंने उत्सुकता से पूछा।

वे बड़े प्रेम से मुझे समझाते हुए बोले ‘‘अबुल, लोग मुझे अपना हमदर्द मानकर अपनी परेशानियाँ बताते हैं और मैं उन्हें ध्यान से सुनता हूँ। फिर उन्हें अपनी खुद की तकलीफें समझकर खुदा के सुपुर्द कर देता हूँ। वह परवरदिगार तो सबका रखवाला है, मेरे बच्चे। वह सबके कष्ट दूर करता है और ये लोग समझते हैं कि यह सब मेरे छुए हुए पानी के चमत्कार से हो रहा है।’’ 

अपने पिताजी की उन्हीं उँगलियों को थामे चलता हुआ मैं आश्चर्य से पहले उनकी उँगलियों को देखता, फिर चेहरे की ओर देखने लगता। न जाने कहाँ से इतनी सज्जनता और शांति पाई थी उन्होंने! उनका जीवन खुद ही तमाम कष्टों से भरा हुआ था, लेकिन फिर भी वे निस्स्वार्थ भाव से दूसरों के सुख की कामना करते थे। स्त्री-पुरुष, छोटे-बड़े, वृद्ध-युवा—सभी मेरे पिताजी का बेहद सम्मान करते। मैं खुद भी अपने पिता के विराट् व्यक्तित्व और व्यापक आभा-मंडल के सामने नतमस्तक रहता। मैं उनके प्रति अत्यंत श्रद्धा भाव से भरा हुआ था। धीरे-धीरे मेरे मन में यह बात घर कर गई कि मेरे पिताजी के विचार और उनका जीवन जिस तरह का है, उसे देखकर सच में यही लगता है कि वाकई उनका सीधा संबंध खुदा के साथ जुड़ा हुआ है। 

मैं निरंतर अपने पिताजी की छत्रच्छाया में बढ़ रहा था और उनके सद्गुणों को अपने भीतर विकसित होते हुए देख रहा था। 

हम रोज तड़के घर से निकलकर पहले मसजिद जाते, नमाज पढ़ते और फिर अपने नारियल के बाग में पहुँचते। रास्ते भर सभी लोग मेरे पिताजी को सम्मान से प्रणाम करते थे। वे भी सभी को प्रेमपूर्वक उत्तर देते।

‘‘आदाब अर्ज है, इमाम साहब।’’

‘‘खुश रहो। सब खैरियत है?’’

‘‘बस, आपकी दुआ है और अल्लाह का फजल है, साहब।’’

हमारे नारियल के बाग हमारे घर से चार किलोमीटर की दूरी पर थे।

‘‘आप यहाँ बैठिए, इमाम साहब। मैं अभी झट से नारियल तोड़े देता हूँ।’’

एक युवक ने नजदीक के बड़े से पत्थर को अपनी हथेली से झाड़ते हुए साफ किया और पिताजी से वहाँ बैठने के लिए कहा। फिर अगले ही पल वह झटपट नारियल के पेड़ पर चढ़ गया और पाँच-छह नारियल तोड़कर नीचे गिरा दिए। मैं यह सब देख रहा था। 

पेड़ पर चढ़ने की कोशिश तो मैं भी किया करता था, लेकिन चढ़ नहीं पाता था, छोटा बालक जो था...और वे ऊँचे-ऊँचे पेड़!

‘‘अबुल, अभी तुम छोटे बच्चे हो, अभी नहीं चढ़ पाओगे, बेटा। लेकिन देखना, तुम एक दिन इस पेड़ से भी बड़े बनोगे।’’ पिताजी ने प्यार से कहा।

मैं अपना सिर ऊपर उठाकर आसमान को छूते हुए से उस ऊँचे पेड़ की ओर देखने लगा, मानो मैं भी अपने सपनों को और ऊपर...और ऊपर उठा रहा हूँ। 

‘सचमुच! मैं भी एक दिन बहुत बड़ा बनूँगा, आसमान को छू लूँगा।’ मैंने खुद से वादा किया। 

तब तक वह युवक नीचे उतर आया और कटे नारियलों को उठाकर ठीक से बंडल में बाँधने लगा। यही रोज का नियम था। 

वे दोनों लोग कुछ देर तक मौसम, बरसात, फसल, जलवायु आदि के बारे में बातचीत करते, तब तक मैं वहीं खेलता रहता। पिताजी उसे भी नारियल देते। फिर हम अपने घर की ओर चल देते। वे रास्ते में भी एक-दो नारियल अपने जान-पहचानवालों को या किसी जरूरतमंद को देते जाते थे। एक-दो पड़ोसियों को भी देते; बाकी बचे मेरी माँ को पकड़ा देते, जिससे मेरी माँ स्वादिष्ट कढ़ी और चटनी बनाती थीं। 

मेरी माँ के हाथ से बने व्यंजनों में गजब का स्वाद होता था। माँ के हाथ का बना साँभर, यदि कोई एक बार खा लेता तो कभी उसका स्वाद नहीं भूल पाता था। मैं दूर से बैठा देखता रहता कि मेरी माँ कितनी मेहनत और प्यार से भोजन पकाती हैं। उनके हाथों से एक-एक मसाला बहुत नाप से और संतुलित मात्रा में पड़ता था। मेरी दादी और माँ मिल-जुलकर घर के काम किया करती थीं। कितना सुंदर था बचपन। 

मैं भूखा घर लौटा और माँ को खोजने लगा, ‘‘अम्मा, अम्मा! कहाँ हो?’’

‘‘शऽऽऽ...तेरी अम्मा अभी नमाज पढ़ रही है।’’ दादी धीरे से बोलीं।

मैं चुपके से रसोई की ओर बढ़ा और बड़े चाव से एक-एक पतीले को खोलकर देखने लगा कि आज माँ ने क्या पकाया है।

‘‘क्या देख रहा है, अब्दुल? भूख लगी है मेरे बच्चे को?’’ तभी मेरी माँ ने पीछे से आकर पूछा।

‘‘हाँ अम्मा! बहुत तेज’’...और मैंने अपने पिचके हुए पेट पर अपनी दोनों हथेलियाँ रखकर बताया।

माँ मुसकरा दीं। प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरा और जमीन पर दरी बिछाते हुए बोलीं—

‘‘बैठ, तुझे झट से खाना दूँ।’’

माँ ने केले के पत्तल में मेरे लिए चावल, साँभर और चटनी परोसी। मैं बड़े चाव से खाना खाने लगा और माँ मेरी ओर प्यार से निहारती रहीं।

‘‘अच्छा लगा?’’ उन्होंने पूछा।

‘‘हाँ, बहुत अच्छा लगा। अम्मा! तुम्हारे हाथ के खाने में जादू है।’’

‘‘...तू तब भी मोटा नहीं होता!’’ हम दोनों जोर-जोर से हँसने लगे।

‘‘अम्मा, आप पाँचों वक्त की नमाज पढ़ती हैं?’’

‘‘हाँ बेटा, हम पूरे दिन अपने कामों में ही डूबे रहते हैं। ऐसे में बीच-बीच में खुदा को भी याद करते रहना चाहिए।’’

मैंने अपना सिर हिला दिया और भोजन का स्वाद लेता रहा।

‘‘अम्मा, आप और दादी दिनभर काम करती हैं। आप लोग थक जाती होंगी न?’’

‘‘न बेटा, अपने काम में थकना कैसा? यह हमारा घर है। अब तो तुम्हारी बहन जोहरा भी काम में मेरी मदद करने लगी है। तू भी तो अपने अब्बू की मदद करता है। तू खूब मेहनत से अपनी पढ़ाई पूरी कर, फिर जब तू बड़ा आदमी बन जाएगा, तब मैं भी आराम किया करूँगी।’’

माँ प्यार से मुझे अपने पास बैठा लेतीं; मेरी बातें सुनतीं, प्रश्नों के जवाब देतीं और कहानियाँ सुनातीं। फिर कुछ देर बाद अपने किसी और काम में जुट जातीं। यही उनकी दिनचर्या थी। हमारे यहाँ दादा-दादी, चाचा-चाची और उनके बच्चे सब मिलाकर खूब भरा-पूरा परिवार था। रिश्तेदार भी काफी आते रहते थे। मेरी माँ बड़े मन से सबका स्वागत-सत्कार करतीं। उनका मायका काफी सम्मानजनक परिवार था। वे एक आदर्श महिला होने के साथ-साथ नरमदिल और मितभाषी भी थीं। मैंने कभी उन्हें ज्यादा बात करते नहीं देखा। वे पिताजी की सीमित आमदनी और दिनभर के छोटे-मोटे खर्चों में से भी न जाने कैसे थोड़ी-बहुत बचत कर लेती थीं। बचत की यही आदत वे हम सबके भीतर भी डाला करती थीं।

‘‘जोहरा, आज की तरकारी खरीदने के बाद ये जो पैसे बचे हैं, उन्हें जरा गुल्लक में तो डाल दे, बिटिया।’’

‘‘अम्मा, इत्ते से पैसे! इतने से पैसों से क्या होगा?’’

‘‘न बिटिया, ऐसा नहीं कहते। ये जोड़े हुए थोड़े-थोड़े से पैसे ही एक दिन ज्यादा बन जाते हैं। फिर ये आड़े वक्त में बहुत काम आते हैं।’’

मैंने अपनी माँ के चेहरे पर कभी भी खीझ या क्रोध का भाव नहीं देखा। वे सबका पूरा ध्यान रखती थीं। यही कारण था कि मेरा परिवार प्रसन्नचित्त रहनेवाला परिवार था। हम सभी आपस में प्रेम और निष्ठा से रहते थे। मेरी बहन जोहरा हम सब भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं। वे माँ का खूब हाथ बँटातीं। बहन जैसे-जैसे बड़ी होती जा रही थीं, माँ की सहेली बनती जा रही थीं। वे घर को सजाती-सँवारतीं और हम छोटे-छोटे शैतान बच्चों का भी ध्यान रखतीं, हमें खूब साफ-सुथरा रखतीं। जरा सा भी गंदा हो जाने पर हमें डाँटा करतीं। हमारे भरे-पूरे घर में हमेशा रौनक बनी रहती थी। अकेलापन या बोर होना किसे कहते हैं, हम जानते भी नहीं थे। हम छोटे-छोटे शैतान बच्चे नित नई शैतानियाँ करते रहते, हालाँकि मैं अपने सब भाइयों में कम शैतान था, या शायद था ही नहीं।

‘‘हाय, हाय! मार क्यों रही है, जोहरा? बच्चा ही तो है बेचारा।’’ दादी चिल्लाईं।

‘‘बच्चा है यह! यह पड़ोसवालों के पेड़ पर चढ़कर आम चुरा रहा था।’’

‘‘हा...हा...हा...अरे, तो इसे चोरी थोड़े ही न कहते हैं! छोड़ लड़के को।’’ मेरी दादी बहन को शांत करते हुए भाई को मार से बचा लेतीं।

मेरी बहन दादी से गुस्से में कहतीं, ‘‘उसे देखो आप, वह अब्दुल! वह भी तो बच्चा ही है और उम्र में इससे भी छोटा है; लेकिन मजाल है कि कभी कहीं से जरा भी शिकायत सुनने को मिल जाए। हमेशा पढ़ता रहता है या शांति से अपना काम करता रहता है।’’ मेरी बहन का इशारा मेरी तरफ होता था। 

अचानक कोई बच्चा तकरार करने लगता तो कोई किसी का खिलौना तोड़ देता। किसी-किसी की आपस में मारपीट शुरू हो जाती। लेकिन आखिर में सब एक हो जाया करते थे। मुझे नहीं याद आता कि कभी कोई झगड़ा लंबा चला हो। मेरी दादी, माँ और बहन सब सुलझा देती थीं। हमारा पूरा परिवार एक-दूसरे की मदद के लिए हमेशा तैयार रहता था। 

मेरी बहन का मन बहुत कोमल था। मेरे लिए उनके हृदय में विशेष जगह थी। उन्हें हर वक्त मेरी फिक्र रहती और वे मेरे खाने-पीने, सोने-जागने, पढ़ने-लिखने—हर बात का खूब ध्यान रखती थीं। उन्हीं दिनों मेरा एक और रिश्ते का भाई हमारे साथ रहने के लिए आया—अहमद जलालुद्दीन।

‘‘हाउ डू यू डू?’’ मुझे पढ़ता हुआ देख उन्होंने पूछा।

‘‘अरे वाह, आपको तो अंग्रेजी भी आती है!’’ मैं हैरान होकर उनकी ओर देखने लगा।

‘‘अरे वाह नहीं...बोलो, आई एम फाइन सर, समझे?’’

‘‘जी भाईजान, समझ गया। आप अंग्रेजी पढ़ते हैं?’’

‘‘हाँ! मैं आठवीं तक पढ़ा हूँ, आगे भी पढ़ना चाहता था; लेकिन...’’

‘‘लेकिन क्या?’’

‘‘घर के हालात और पैसे कमाने की जिम्मेदारी के कारण पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी।’’ वे उदास हो गए, फिर एकाएक उत्साहित होते हुए बोले, ‘‘लेकिन तुम कभी अपनी पढ़ाई बीच में मत छोड़ना। पता है, अब्दुल! यह दुनिया सिर्फ उतनी ही नहीं है, जितनी रामेश्वरम से दिखती है। उससे भी कहीं ज्यादा है, लाखों-करोड़ों गुना ज्यादा।’’

‘‘हाँ, हमारे भूगोल के अध्यापक भी यही बताते हैं।’’

‘‘और क्या-क्या पढ़ते हो तुम?’’

‘‘हम इतिहास, भूगोल, विज्ञान सब पढ़ते हैं। खूब बड़ा तो नहीं है हमारा स्कूल, लेकिन इस शहर में यही एक स्कूल है—पंचायत प्राइमरी स्कूल। हमारे सभी अध्यापक बहुत अच्छे हैं।’’ मैंने चहकते हुए बताया।

‘‘शरारतें करते हो स्कूल में?’’ उन्होंने एकाएक पूछा और मैं शरमाते हुए बोला, ‘‘ज्यादा नहीं, पर कभी-कभी। लेकिन कुछ लड़के तो बस, शैतानी करने ही आते हैं स्कूल में।’’

हम हँसने लगे।

‘‘मैं तुम्हारे स्कूल आऊँगा एक दिन।’’

‘‘हाँ भाईजान, आना। समुद्र के किनारे है हमारा स्कूल। हमारे स्कूल का थोड़ा सा हिस्सा ईंटों का बना है। वह आपको दूर से ही नजर आने लगेगा। ज्यों ही बड़ा सा छप्पर दिखाई दे आपको, तो समझ जाना कि वही है हमारा स्कूल।’’

‘‘अच्छा, ठीक है। तुम खुद ही ले चलना मुझे एक दिन अपने साथ।’’

‘‘जी भाईजान! यह ठीक रहेगा। आप मेरे साथ ही चलना।’’ मैं खुश होकर बोला।

मुझे अपना स्कूल, अपने सभी अध्यापक और मित्र बहुत प्रिय थे। वे सब भी हमारा खूब ध्यान रखते थे। एक दिन मैं स्कूल नहीं जा पाया तो शाम को मेरे गणित के मास्टरजी घर आ गए।

‘‘आज कलाम विद्यालय क्यों नहीं आया?’’

‘‘आज इसकी तबीयत ठीक नहीं है, मास्टर साहब।’’ पिताजी ने चिंतित होते हुए कहा।

‘‘इमाम साहब, कोई और बात तो नहीं है? कोई आर्थिक परेशानी या किसी और तरह की दिक्कत हो तो हमें जरूर बताइएगा; लेकिन कलाम को विद्यालय नियम से भेजते रहिएगा। हमारा कलाम बहुत बुद्धिमान बच्चा है।’’

मेरे पिताजी मेरी तारीफ सुनकर बहुत खुश हुए और बोले, ‘‘मास्टर साहब, हमारे घर में कलाम ही गणित में सबसे ज्यादा होशियार है। मैं इसका ट्यूशन लगाना चाहता हूँ, ताकि यह और मेहनत से पढ़ सके। हिसाब में इसकी कोई दुविधा न रहे।’’

‘‘ट्यूशन तो मैं ही पढ़ा दूँगा, लेकिन बच्चे को रोज तड़के 4 बजे मेरे पास पढ़ने आना पड़ेगा और वह भी नहा-धोकर।’’

मैं मास्टरजी से ट्यूशन पढ़ना चाहता था, इसलिए मैं फौरन राजी हो गया।

‘‘सुबह-सुबह 4 बजे कैसे नहाएगा? अभी बच्चा है।’’ माँ के चेहरे से विस्मय और दया के मिले-जुले भाव छलक रहे थे।

‘‘मैं उन्हीं बच्चों को पढ़ाता हूँ, जो नियमित सुबह नहा-धोकर आते हैं; क्योंकि जो बच्चा सुबह नहाता नहीं, वह सोता रहता है। नींद में डूबा बच्चा गणित के सवाल कभी हल कर ही नहीं सकता।’’

हमारे गणित के मास्टरजी नियम के सख्त जरूर थे, लेकिन स्वभाव से बहुत अच्छे थे। मैंने उनसे ट्यूशन पढ़ना शुरू कर दिया। मेरी माँ तड़के 3:30 बजे ही मुझे जगा देतीं।

‘‘अब्दुल, उठ जा मेरे बच्चे। ट्यूशन पढ़ने जाना है न? देख, मैं तेरे नहाने के लिए पानी भी रख आई हूँ।’’

मैं झटपट उठ जाता और मेरी माँ मुझे नहला-धुलाकर कंघी करते हुए कहतीं, ‘‘बेटा, गणित पढ़कर सीधे अरबी स्कूल चले जाना, दोस्तों के साथ इधर-उधर मत घूमना।’’

‘‘नहीं घूमूँगा, अम्मा। मैं गणित पढ़कर सीधे अरबी स्कूल जाऊँगा। मुझे भी ‘कुरान शरीफ’ सीखनी है।’’

माँ मेरे माथे को चूमकर कहतीं, ‘‘मैं तेरी पसंद का नाश्ता बनाकर रखूँगी।’’ 

मैं हँसता हुआ अपनी स्लेट-खडि़या उठाता और पढ़ने चल देता। ‘कुरान शरीफ’ सीखने के बाद मेरे बाल मन में तरह-तरह के प्रश्न उठने लगते थे। मेरी अनेक जिज्ञासाओं का समाधान मेरे पिताजी के अलावा जलालुद्दीन भी किया करते थे।

‘‘खुदा कैसा है, भाईजान?’’

‘‘खुदा तो बहुत नरम है। वह हम सबका दोस्त है।’’

‘‘दोस्त!’’ मैंने हैरान होकर पूछा, ‘‘अगर वह हमारा दोस्त है तो हम सब उससे डरते क्यों हैं? उसकी बंदगी के लिए इतने नियम-कायदे क्यों हैं?’’

‘‘नियम-कायदे तो हमने ही बनाए हैं। खुदा ने तो कोई नियम नहीं बनाया, वह तो आजाद है। जैसे मैं हूँ, तुम हो, हम सब हैं।’’

‘‘लेकिन अम्मी-अब्बू तो पाँचों वक्त की नमाज पढ़ते हैं, कितने नियम-कायदे मानते हैं और आप कह रहे हैं कि खुदा दोस्त है, आजाद है!’’

‘‘तुम्हारे अम्मी-अब्बू भी अपनी जगह ठीक हैं और मैं भी। देखो अब्दुल, खुदा को मानने का सबका अपना-अपना ढंग है। तुम्हारे अब्बू यही कहते हैं न कि खुदा हम सबके भीतर है? मैं भी तो यही कह रहा हूँ। बस, थोड़ा सा फर्क है। मैं खुदा को दोस्त मानकर उसे अपनी सब समस्याएँ बता देता हूँ, जैसे कि वह कोई जीती-जागती हस्ती हो और मुझे यह विश्वास रहता है कि वह एक अच्छे दोस्त की तरह मुझे रास्ता भी सुझाएगा।’’

मैं मन-ही-मन सोचता कि जलालुद्दीन ठीक ही तो कह रहे हैं। रामेश्वरम जैसे शांत और पवित्र माहौल में हम अलग-अलग धर्मों को माननेवाले लोग अपने-अपने आराध्यों तक अपनी प्रार्थनाएँ अपने-अपने ढंग से पहुँचाते हैं और हम सभी की प्रार्थनाएँ उन तक पहुँच भी जाती हैं। कोई मंदिर जाकर पूजा करता है तो कोई मसजिद से अजान बोलता है, चर्च में प्रेयर होती है; लेकिन पहुँचती तो सब एक ही जगह है। अब मैं भी मानने लगा था कि एक ही सत्ता है, जो हर किसी की फरियाद सुनती है। 


2


ह मारे रामेश्वरम में जीवन बहुत आनंददायी था। हमारा दिन बहुत तड़के समुद्र की लहरों के साथ शुरू होता और जल्दी ही शाम भी ढलने लगती। रोज एक ही समय पर पंबन पुल से रेलगाड़ी गुजरती और उसकी आवाज हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुकी थी। यहाँ प्रसिद्ध शिव मंदिर स्थापित होने के कारण बारहों महीने पर्यटकों का ताँता लगा रहता था। समुद्र, पर्यटक, शिव मंदिर—यही सब कारण थे कि हम रामेश्वरमवासियों का मुख्य व्यवसाय मछली-पालन, नाव की फेरी लगाना, बाहर से आए लोगों को तीर्थयात्रा कराना और उन्हें धार्मिक व कलात्मक वस्तुएँ बेचना आदि बन गया था। मेरे नाविक पिता फेरी लगाया करते थे। लोगों को धनुषकोडि से रामेश्वरम और रामेश्वरम से धनुषकोडि लाया व ले जाया करते थे। यह दूरी करीब 22 किलोमीटर थी। एक दिन मेरे पिताजी ने फेरी के लिए खुद की नाव बनाने का निश्चय किया। 
‘‘ जलालुद्दीन, क्यों न हम खुद ही नाव बनाएँ? तुम्हारा क्या खयाल है, बेटा?’’ 
‘‘जी चचाजान, बिल्कुल बना सकते हैं। काम मुश्किल है, लेकिन नामुमकिन कतई नहीं है।’’
मुझे अपने इस चचेरे भाई की यही बात बहुत अच्छी लगती थी। वे बहुत सकारात्मक विचारोंवाले थे। कभी किसी काम के लिए न तो कहते ही नहीं थे। मैं भी नाव बनाने की पूरी प्रक्रिया को देखने के लिए खासा उत्साहित हो रहा था।
‘‘मैं भी देखना चाहता हूँ कि नाव कैसे बनाते हैं।’’ मैं चहककर बोल पड़ा।
‘‘देखने की इजाजत तभी मिलेगी, जब साथ में काम भी करवाओगे, बच्चू।’’ जलालुद्दीन ने मेरे पेट में गुदगुदी करते हुए कहा।
‘‘हाँ-हाँ, मैं भी काम करवाऊँगा।’’ मैंने भी पूरे आत्मविश्वास से अकड़कर उत्तर दिया।
‘‘हाँ, जरूर! तुम भी साथ में काम करवाना, अबुल।’’ पिताजी ने भी मुसकराते हुए अपनी सहमति दे दी। ‘‘...तो कल से समुद्र के किनारे नाव बनाने का काम शुरू कर दें?’’
‘‘जी हाँ, बिल्कुल।’’ मेरे और जलालुद्दीन के मुँह से एक साथ निकला और हम तीनों जोर से हँस दिए।
हमने अगले ही दिन से नाव बनानी शुरू कर दी। मैं तो बस, नाम के लिए ही काम करवा रहा था। सारी मेहनत मेरे पिताजी, मेरे बड़े भाई और जलालुद्दीन ही कर रहे थे।
‘‘जलालुद्दीन, लकड़ी इन के कटे हुए टुकड़ों को सूखने के लिए फैला दो।’’
‘‘जी!’’
‘‘तब तक तुम इन सूखे टुकड़ों को मुझे देते जाओ। मैं इन्हें घिसकर समतल बना देता हूँ।’’
‘‘अब्बू, मैं क्या काम करूँ?’’
‘‘अबुल, तुम अपने भाई के साथ मिलकर इन सब लकडि़यों को पलट दो, ताकि ये दूसरी तरफ से भी सूख जाएँ।’’
‘‘जी अब्बू।’’
मैं बड़े मनोयोग से पिताजी की आज्ञा का पालन करता रहा था। मेरे लिए यह अद्भुत अनुभव था, जो कि मेरे भीतर के इंजीनियर का भविष्य-निर्माण कर रहा था। मेरे द्वारा कठिन परिश्रम से किया जानेवाला गणित का अध्ययन और अब इन लकडि़यों को करीने से जोड़कर नाव बना देना—ये सब क्रियाएँ मेरे भविष्य का संकेत थीं। मैं बड़ा हो रहा था, सीख रहा था, वह भी खूब जल्दी-जल्दी। जलालुद्दीन मुझे नाव बनाने के साथ-साथ अनेक वैज्ञानिक अनुसंधानों, नवनिर्माण, शिल्प कला, औषधियों, साहित्य आदि की जानकारी भी देते जाते। वे मेरे भीतर एक बुद्धिमान और जिज्ञासु बालक को देखा करते थे। मेरे साथ नई-नई जानकारियाँ साझा करना उन्हें अच्छा लगता था। जलालुद्दीन मुझे ‘आजाद’ कहकर पुकारने लगे।
‘‘आजाद, तुम्हें पता है, इनसानों ने इसी तरह से कोई-न-कोई चीज पहली बार बनाई है। विज्ञान का जन्म भी ऐसे ही हुआ है।’’
‘‘अच्छा भाईजान!...तो क्या इस नाव का निर्माण भी विज्ञान से ही हुआ है?’’ मैंने आश्चर्य से पूछा।
‘‘हाँ, और नहीं तो क्या! उपयुक्त लकड़ी चुनना, फिर उसे सही नाप में काटना, ठीक से जोड़ना, यह सब विज्ञान ही तो है।’’
मेरा बाल मन उत्सुकता से जलालुद्दीन की ये बातें सुन रहा था।
‘‘इनसान को तो पहले आग तक जलानी नहीं आती थी और अब तो जहाज भी उड़ाने लगा है। इन सबके पीछे थोड़ा गणित, थोड़ा सामान्य ज्ञान और बाकी विज्ञान ही है, आजाद!’’
‘‘आप ठीक कह रहे हैं, भाईजान। मैं भी बड़े होकर जहाज उड़ाऊँगा।’’
‘‘हा...हा...हा...क्यों नहीं! तुम जरूर उड़ाओगे। तुम बहुत होशियार हो। तुम ऐसा जरूर कर सकते हो। मुझे पूरा यकीन है तुम पर।’’
मुझे जलालुद्दीन का विश्वास और उनकी ज्ञान भरी बातें बहुत अच्छी लगती थीं। मैं उनसे अपनी तमाम शंकाओं के समाधान माँगता रहता।
‘‘भाईजान, जैसे ये पक्षी उड़ लेते हैं, हम क्यों नहीं उड़ पाते?’’
‘‘पक्षियों का शरीर बहुत हल्का होता है। हमारा शरीर उनसे बहुत बड़ा और भारी होता है; क्योंकि हमारे शरीर में हड्डियाँ हैं, जो कि भारी हैं। ऊपर से इनके पास पंख भी होते हैं, जो हमारे पास नहीं होते।’’
‘‘...अगर हम भी पंख लगा लें तो क्या उड़ सकते हैं?’’
‘‘क्यों? हेलीकॉप्टर नहीं देखा क्या तुमने? हवाई जहाज में भी तो पंख बने होते हैं न?’’
‘‘अच्छाऽऽऽ...इसीलिएऽऽऽ!’’ मैं नया प्रश्न ले बैठता, ‘‘भाईजान, यह रेलगाड़ी का इंजन कैसे काम करता है?’’
‘‘यह भाप से काम करता है।’’
‘‘पानी कैसे बरसता है?’’
‘‘धरती से उड़कर पानी बादल बन जाता है। फिर वे बादल बड़े-बड़े और भारी हो जाते हैं। जब वे बादल अपना वजन सँभाल नहीं पाते या किसी चीज से टकराते हैं तो बरस जाते हैं, बस।’’
‘‘ओह!’’ मेरी छह साल की उम्र के लिए यह सब बातें बहुत कौतूहल से भरी होतीं। जलालुद्दीन यथासंभव मेरी जिज्ञासाओं को शांत करते। मुझे अचरज होता कि उनका ज्ञान अपार था—विज्ञान से लेकर धर्म, स्थापत्य, साहित्य आदि सभी में। मैं नाव की फेरी में उनके साथ बैठ जाता। एक बार एक फेरी में कुछ पर्यटक रामचंद्रजी और सीताजी की कहानी सुना रहे थे। फिर जलालुद्दीन ने उन सबको रामेश्वरम-मंदिर के निर्माण की कहानी सुनाई, जिसे सबसे अधिक उत्सुकता से मैं सुन रहा था।
‘‘साहेब! रामेश्वरम का मंदिर भगवान् शिव को समर्पित है। इस मंदिर के लिंग का स्वरूप खुद सीताजी ने अपने हाथों से बनाया था।’’
फेरी में बैठे अधिकांश पर्यटक इस कथा को जानते थे, लेकिन स्थानीय लोगों के मुँह से सुनना उनके लिए अनूठा अनुभव होता। कहीं-न-कहीं उनके मन में यह भी बात रहती कि इन लोगों के मुँह से कहीं कोई नई बात जानने को मिल जाए, इसलिए वे खुश होकर सुनने लगते।
‘‘भगवान् राम ने वानरों की सेना के साथ मिलकर सेतु का निर्माण यहीं से शुरू किया था। जब वे लंका के राजा रावण को पराजित कर सीताजी को वापस लाए, तब यहीं आकर रुके थे। रावण वध का प्रायश्चित्त करने के लिए उन्होंने हनुमानजी से कहा कि वे उत्तर दिशा के पर्वतों में से एक शिवलिंग लेकर आएँ। लेकिन हनुमानजी जब आए तो इतना बड़ा शिवलिंग ले आए कि सीताजी ने उसे स्वीकार नहीं किया।’’
‘‘फिर?’’ नाव चल रही थी और सब शांत होकर यह कथा सुन रहे थे। मैं उत्सुकता से बोल पड़ा।
‘‘फिर सीताजी ने अपने हाथों से शिवलिंग बनाया और विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की।’’
इस प्रकार की अनेक कथाएँ कभी जलालुद्दीन सुनाते तो कभी कोई और फेरी चालक या फिर देश भर से आए हुए पर्यटकों में से कोई, जो हमारे साथ बैठा होता। 
एक-दूसरे से बिना टकराए हुए तैरती रंग-बिरंगी नावें और उनमें सवार लोग—यह बहुत सुंदर दृश्य होता था। मेरे पिताजी का नाव का कारोबार अच्छा चलता था। बाहर के लोग जब हमारे शहर रामेश्वरम में आते तो वे धनुषकोडि और सागर-संगम में स्नान के लिए भी जाते। वहाँ ऐसी मान्यता थी कि यह यात्रा उसी के बाद अपना पूरा पुण्य देती है।
‘‘आइए, आइए! बाबू साहब, हमारी फेरी में बैठिए! हम आपको धनुषकोडि तक दर्शन कराकर लाएँगे।’’
‘‘सागर-संगम में भी स्नान करा दोगे, भैया?’’ वे हमसे पूछते।
‘‘हाँ-हाँ, बाबूजी! वह तो जरूर ही कराएँगे। जो यहाँ तक आए और सागर-संगम में स्नान न करे, उसका तो आना भी पूरा नहीं माना जाता। हम आपको दोनों काम करवाएँगे। आइए, बैठिए हमारी फेरी में।’’
पैसों को लेकर थोड़ा मोलभाव होता, फिर लोगों से लदी फेरी तैरती हुई आगे बढ़ने लगती। बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर का मिलन-स्थल सागर-संगम कहलाता है, यह बात मुझे पिताजी ने बताई थी। यहाँ अकसर तूफान भी आते रहते थे। पिताजी ने बताया था कि ये तूफान बंगाल की खाड़ी से आते हैं। ये ज्यादातर नवंबर और मार्च के महीनों में अपने विकराल रूप ले लेते हैं। 
मुझे आज भी याद है वह खौफनाक रात! हम सब सो रहे थे, तभी दादी ने मेरे पिताजी को आवाज दी—
‘‘जैनुलाबदीन, देख तो बेटा! कितनी तेज हवा चल रही है!’’
‘‘हाँ अम्मा! लगता है, तूफान फिर उठा है। तू सो जा, हम सब हैं न, सँभाल लेंगे।’’
‘‘हाँ बेटे! खुदा खैर करे। यह तूफान और जोर न पकड़े। बस, ऐसे ही गुजर जाए।’’
...लेकिन नहीं। उस रात वह तूफान भयंकर तांडव मचाने आया था, सो ऐसे कैसे गुजर जाता!
‘‘सुनिए, आपने नावें कसके बाँध तो दी थीं न?’’ माँ ने पिताजी से पूछा।
‘‘हाँ, बाँध तो दी थीं, लेकिन यह आँधियाँ बहुत बलशाली होती हैं। जब आती हैं तो अपने साथ सब उड़ा ले जाती हैं, सब तबाह कर जाती हैं।’’
मेरे माता-पिता बहुत चिंतातुर थे। आज की रात पूरा शहर जाग रहा था। सब अपने-अपने घरों में दुबके परमात्मा से प्रार्थना कर रहे थे, दया की भीख माँग रहे थे और वह आँधी चीखती हुई, सीटी बजाती हुई भयंकर रूप धारण करती जा रही थी। वह अपने मार्ग में आनेवाले किसी भी पेड़, घर, सामान को नहीं बख्श रही थी। हर ओर तबाही मचाती हुई आगे बढ़ रही थी। उन दिनों घरों में बिजली नहीं होती थी, लैंप जला करते थे। आज वे भी बुझे जा रहे थे। सभी ओर भय का माहौल था। तभी तेज बरसात शुरू हो गई।
‘‘अब्दुल बेटा, बैठा क्यों है? आजा लेट जा मेरे पास।’’ दादी ने प्यार से मेरा सिर अपनी गोद में लेते हुए कहा। वे समझ गई थीं कि मैं अंदर-ही-अंदर बहुत डर रहा हूँ; बल्कि सच तो यह है कि उस रात पूरा रामेश्वरम ही डर में डूबा हुआ था। आनेवाली तबाही के बारे में सोच-सोचकर कि न जाने यह तूफान कितनों का संसार उजाड़कर रख जाएगा।
मेरे पिता का मन समुद्र किनारे बँधी नावों में अटका हुआ था। वहाँ उनकी मेहनत की कमाई जो बँधी हुई थी, उनकी रोजी-रोटी, जो कि उन्होंने खुद अपने हाथों से बनाई थीं। मैं भी डर रहा था कि कहीं कोई आदमी, कोई बच्चा न फँस गया हो इस तूफान में। किसी का परिवार या किसी माँ की गोद सूनी न हो, ऐ खुदा! 
सबके अपने-अपने भय थे। सभी मन-ही-मन खैरियत मना रहे थे और इस तूफान के गुजर जाने की राह तक रहे थे। अगली सुबह तूफान गुजर जाने के बाद हमने प्रकृति की भयंकर विनाश-लीला देखी। हर ओर टूटे पड़े घर, जड़ से उखड़े हुए पेड़...भयंकर विनाश-लीला। कई रास्ते तो नष्ट ही हो गए थे। हर ओर अफरा-तफरी मची हुई थी। लोग भरी-भरी आँखें और रुँधे गले से अपनी बरबादी का मंजर देख रहे थे। रेडियो में खबरें आ रही थीं कि इन हवाओं की रफ्तार सौ मील प्रति घंटा थी। कुछ लोग अपने बाग-बगीचे, खेत-खलिहान, नावें देखने भागे जा रहे थे तो कुछ लोग अपने टूटे घर सँवार रहे थे। छोटे बच्चे बिलख रहे थे, बड़े लोग गमगीन थे। सब तरफ मातमी माहौल छाया हुआ था। 
मेरे पिताजी, जो कि दौड़कर नाव देखने गए थे, अब बुझे कदमों से वापस घर लौट रहे थे। वे दालान में सिर झुकाकर बैठ गए।
‘‘क्यों जी, सब ठीक तो है न? आप कुछ बोलते क्यों नहीं?’’ माँ ने पिताजी से पूछा।
पिताजी कुछ भी नहीं बोले, बस अपनी आँखों में आँसू भरकर माँ की तरफ देखने लगे। माँ और हम सब समझ गए।
‘‘कोई बात नहीं, हम फिर से बना लेंगे। बुरी रात थी, आई और टल गई। आप चिंता मत कीजिए।’’ माँ बहुत हौसलेवाली थीं। इस वक्त वे अपना यही हौसला मेरे पिताजी के भीतर भरने लगीं।
‘‘न बेटा, उदास मत हो। खुदा का खैर है कि हम सब सही-सलामत हैं। अल्लाह बच्चों को लंबी उम्र दे। नाव का क्या है, फिर बन जाएगी। हम सब साथ हैं न!’’ मेरी दादी ने पिताजी के पास बैठते हुए कहा।
सच ही कहा था दादी ने, हम सब साथ थे। हमारी इसी एकता और आपसी प्रेम के कारण ही हम अपने ऊपर आई बड़ी-से-बड़ी विपत्ति को भी दूर भगा देते। मेरे पिताजी बेहद आत्मसंयमवाले व्यक्ति थे। उनका यही आत्मसंयम संकट के समय में उनकी ताकत बन जाता था। 
कुछ समय गुजरा। हमने नई नाव बना ली थी और फिर वही कारोबार शुरू हो गया। जिंदगियाँ फिर चल पड़ीं। फिर से तीर्थयात्री आने लगे, बाजार सजने लगे, मंदिर-मसजिद आबाद होने लगे। इस तरह के तूफान हमारे शहर में आते ही रहते थे। हमें इन्हीं के साथ जीना था और अपनी जीवन-नैया को पार भी लगाना था। हमें परिस्थितियों ने हर हाल में जीना एवं खुश रहना सिखा दिया था और हम सीख भी गए थे। 
तब रामेश्वरम एक छोटा सा टापू था। यहाँ के ‘गंधमादन पर्वतम’ की ऊँचाई सबसे अधिक है। आज भी इसकी चोटी पर चढ़कर पूरे रामेश्वरम को देखा जा सकता है। यहाँ से देखने पर दूर-दूर तक फैले नारियल के पेड़ों के हरे-हरे पत्ते बहुत सुहावने लगते हैं, मानो किसी चित्रकार ने अपनी रंग से भरी कूची चला दी हो। इस चोटी से समुद्र को देखना भी बहुत सुखद एहसास देता है। इसी तरह से इस शहर का एक और आकर्षण है—रामनाथ स्वामी मंदिर का गोपुरम, जो कि ऐसा लगता है, मानो आकाश की ऊँचाइयों को छू रहा हो। यहाँ का सौंदर्य वही व्यक्ति समझ सकता है, जिसने इसे साक्षात् आकर देखा हो। रामेश्वरम एक तीर्थ-स्थल के रूप में भारत का विख्यात धार्मिक पर्यटन स्थल है। यहाँ वर्ष भर दर्शनार्थी आते रहते हैं। हिंदू धर्म-स्थल होने के कारण वैसे तो यहाँ हिंदू परिवार ही ज्यादा हैं, लेकिन कहीं-कहीं मुसलिम और ईसाई परिवार भी रहते हैं। यहाँ सभी प्रेम और शांति से जीवनयापन करते हैं, जात-पाँत के झगड़े यहाँ नहीं सुनने को मिलते। सभी त्योहार मिल-जुलकर श्रद्धा और प्रेम से मनाए जाते हैं। 
जब मैं छोटा था, तब देश में अंग्रेजों की हुकूमत थी, साथ ही स्वतंत्रता का आंदोलन भी अपने चरम पर था। देश भर में फैले जातिगत द्वेष और सांप्रदायिक हिंसा की खबरें हमें भी अखबार में पढ़ने को मिलती रहती थीं, लेकिन हमारा रामेश्वरम इस आग से अछूता था। 
पिताजी ने मुझे आवाज देते हुए कहा, ‘‘अबुल, जल्दी चल बेटा, आज सीता-राम विवाह समारोह है। हर साल की तरह इस साल भी हम लोगों को ही विवाह स्थल तक भगवान् श्रीराम की मूर्तियाँ लेकर जानी हैं। हमारी नाव से ही यह मूर्तियाँ जाएँगी, बेटा।’’ पिताजी ने अपना गमछा सँभालते हुए मुझे जल्दी से चलने का इशारा किया।
‘‘हाँ अब्बू, मैं तैयार हूँ, चलिए।’’ मैं उछलकर चल दिया। मुझे वह समारोह देखना बहुत अच्छा लगता था। अब मैं बड़ा हो रहा था और हर चीज के बारे में बहुत उत्सुकता से पूछता था। मैं नई-नई बातें जानना चाहता था।
‘‘अब्बू, वह विवाह स्थल कहाँ है?’’
‘‘बेटा, वह तालाब के बीचोबीच बना हुआ है। उसे ‘रामतीर्थ’ नाम से पुकारा जाता है।’’
‘‘आपके अब्बू भी विवाह स्थल तक भगवान् श्रीराम की मूर्तियाँ लेकर जाते थे?’’
‘‘हाँ, बेटा! इसके पीछे भी एक सच्ची घटना है। तुम सुनोगे?’’
‘‘हाँ, सुनाइए न! मैं सुनना चाहता हूँ।’’ मैंने चलते-चलते चहककर कहा।
‘‘बहुत साल पहले की बात है। एक बार मेरे दादाजी के दादाजी ने रामनाथ स्वामी मंदिर की मुख्य मूर्ति बचाई थी।’’
‘‘क्या! उन्होंने कैसे बचाई? हम तो मूर्ति की पूजा करते ही नहीं!’’
‘‘अरे, पहले मेरी पूरी बात तो सुन। एक बार ऐसे ही एक त्योहार के समय भगवान् की मूर्ति को गर्भगृह से एक जुलूस के साथ मंदिर ले जाया जा रहा था कि अचानक मूर्ति तालाब में गिर गई। बेहद भीड़भाड़ होने के कारण पहले तो लोगों को यह बात पता ही नहीं चली; लेकिन जैसे ही उनका ध्यान गया कि मूर्ति तो तालाब में गिर गई है, सब डर गए। वे इसे आनेवाले समय के लिए अशुभ संकेत मानने लगे। लेकिन तभी उस भीड़ में से एक आदमी बिना डरे बहादुरी से उस तालाब में कूद गया और कुछ ही देर में भगवान् की उस मूर्ति को निकाल लाया। पता है, वह बहादुर आदमी कौन था?’’
‘‘मेरे अब्बू के दादाजी के दादाजी, है न?’’ मैंने ताली बजाते हुए उछलकर कहा।
‘‘हा...हा...हा...सही कहा तुमने। फिर पता है, क्या हुआ, अबुल?’’
‘‘क्या हुआ?’’ मैं आगे की घटना जानने के लिए उत्सुक हो रहा था।
‘‘फिर सब लोग बहुत खुश हो गए। मंदिर के पुजारी ने दादाजी को धन्यवाद कहा।’’
‘‘क्या उन्हें पता था कि आपके दादाजी के दादाजी मुसलमान हैं?’’
‘‘हाँ अबुल, सब जानते थे, लेकिन बेटा, हमारे रामेश्वरम में किसी के मन में भेदभाव की भावना नहीं है। न तो तब थी और न ही अब है। बल्कि सबने दादाजी को बहुत शुक्रिया कहा और उसके बाद घोषणा की गई कि हर त्योहार में मंदिर की तरफ से उन्हें सम्मानित किया जाएगा। उसके बाद से दादाजी को हर साल ‘मुदल मरायादाई’ के सम्मान से नवाजा जाने लगा। यह एक अनोखा सम्मान था, जो मंदिर की तरफ से दूसरे धर्म के माननेवालों को आदर के साथ दिया जाता था। यह ‘मुदल मरायादाई’ उनके बाद उनकी नई पीढ़ी को भी दिया जाता रहा।’’
‘‘क्या वह आपके पिताजी को भी दिया जाता था?’’
‘‘हाँ बेटा।...और अब हम जाते हैं भगवान् की मूर्ति को अपनी नाव से लेकर।’’
‘‘बड़ा होकर मैं भी जाऊँगा।’’
उन्होंने प्यार से मेरे सिर पर अपना हाथ फेरा। 
मैं पिताजी की तरफ सम्मान से देखने लगा। वे मुझे देखकर प्यार से मुसकरा रहे थे। बहुत श्रद्धा और प्रेम से वह सीता-राम विवाह समारोह मनाया गया, जो कि काफी लंबा चला। मैं देख-देखकर खुश हो रहा था। 
मेरे पिताजी रामेश्वरम मसजिद के इमाम थे और बहुत ही आस्था से ‘कुरान’ का पाठ करते थे। उन्होंने हम सभी भाई-बहनों में भी अपने धार्मिक संस्कार रोपे थे। वे अकसर हम लोगों को नमाज पढ़ने के फायदे बताते। मेरे पिता अधिक पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन वे बहुत बेहतरीन मनोचिकित्सक थे। शहर भर के लोग उनके पास अपनी अलग-अलग व्यक्तिगत समस्याएँ लेकर आते और पिताजी प्रेमपूर्वक सबकी बात सुनते, समाधान बताते। रामनाथ स्वामी मंदिर के मुख्य पुजारी पक्षी लक्ष्मण शास्त्री और चर्च के फादर बोदल मेरे पिताजी के बहुत अच्छे मित्र थे। पक्षी लक्ष्मण शास्त्री को वेदों का गहरा ज्ञान था और फादर बोदल आध्यात्मिक व्यक्ति थे। मुझे उन तीनों मित्रों का आपसी स्नेह आज भी याद है। वे तीनों हर शुक्रवार को शाम 4:30 बजे एक जगह साथ बैठते और धार्मिक-आध्यात्मिक चर्चा किया करते। शहर के लोगों की समस्याओं पर भी विचार करते और आवश्यकता पड़ने पर किसी मुद्दे पर सम्मिलित निर्णय भी लिया करते। शहर के और लोग भी उनकी चर्चा में शामिल हो जाते थे। उन तीनों के प्रयासों के कारण ही हमारे शहर में सांप्रदायिक हिंसा का असर नाममात्र का भी नहीं होता था।
‘‘आइए-आइए, इमाम साहब! आज आपको आने में देर कैसे हो गई?’’
‘‘रास्ते में एक दुखियारी वृद्ध महिला अपने कष्ट कहने लगी। वही सुनने में जरा देर हो गई।’’
‘‘आप शहर के लोगों को उनके दुःख-तकलीफ में बहुत दिलासा देते हैं। हमें गर्व है आप पर।’’
‘‘आप खुद बहुत विद्वान् हैं, शास्त्रीजी। लोगों को धर्म और ज्ञान का रास्ता दिखाते हैं। मैं तो आपसे सीख हासिल करता हूँ।...लीजिए, फादर बोदल भी आ गए।’’
‘‘मित्र, हम एक ही ईश्वर के बनाए बंदे हैं। हमारे जीवन का मकसद ही दूसरों की भलाई और उन्हें सही रास्ता दिखाना है।’’ फादर बोदल अपनी शांत, किंतु प्रभावशाली आवाज में बोले।
‘‘आप ठीक कह रहे हैं, फादर। हम दोनों आपकी बात से सहमत हैं।’’
तीनों मित्र शहर के लोगों की चिंता करते, काफी देर तक उनकी भलाई और तरक्की के बारे में चर्चाएँ करते। उन तीनों की छवि मेरी यादों में आज भी ज्यों-की-त्यों है। एक अपनी पगड़ी और इमाम के लंबे अँगरखे में, दूसरा धोती और कुमुदी (चोटी) में, तीसरा अपने सफेद गाउन में। वे तीनों शहर में किसी अफवाह के फैलने से पहले ही उसे रोक देते, कोई समस्या नजर आती तो पहले ही स्तर पर सुलझाने की कोशिश में लग जाते। वे अकसर आपस में देश के स्वतंत्रता आंदोलन पर भी सार्थक बातचीत करते, अपने-अपने विचार रखते। लोग उनकी बातचीत सुनकर बहुत प्रेरणा लेते थे। 
हम बच्चों के प्रति भी उन तीनों का अपार स्नेह था। पक्षी लक्ष्मण शास्त्री का बेटा रामनाथन शास्त्री मेरा दोस्त था। हम शुरू से एक ही कक्षा में पढ़ा करते थे। 
उन्हीं दिनों की एक घटना है, जो कि मेरे शहर के धार्मिक सौहार्द का अद्भुत उदाहरण है। यह घटना तब की है, जब मैं तीसरी कक्षा में पढ़ता था और आठ साल का था। मेरी दोस्ती रामनाथन शास्त्री, अरविंदन और शिवप्रकाशन से थी। वे तीनों ही ब्राह्मण परिवार से थे। कक्षा के बाहर हो या भीतर, हम हमेशा मिल-जुलकर रहते, साथ पढ़ते, साथ-साथ अपना दोपहर का भोजन करते। यदि हममें से कोई एक भी विद्यालय न आता तो उसकी चिंता करने लगते। मैं और रामनाथन शास्त्री एक ही बेंच पर बैठा करते थे।
‘‘अरे, रामनाथन! सुना है, आज हमारी कक्षा में नए अध्यापक आ रहे हैं।’’ अरविंदन ने कहा।
‘‘हाँ, देखा तो मैंने भी था, मगर दूर से। पता नहीं कैसे स्वभाव के होंगे!’’
‘‘हाँ! पहलेवाले मास्टरजी तो बहुत अच्छे थे। काश, ये भी अच्छे ही हों।’’ मैंने भी अपनी चिंता जाहिर की।
‘‘शऽऽऽ...चुप-चुप, वे आ गए।’’ शिवप्रकाशन, जो कि अब तक कक्षा के दरवाजे पर ही डटा पहरा दे रहा था, जल्दी-जल्दी अपनी बेंच के पास आते हुए बोला।
हम सभी बच्चे अध्यापक के सम्मान में खड़े हो गए। उन्होंने कक्षा में आते ही सबसे पहले आगे से लेकर पीछे तक और दाएँ से लेकर बाएँ तक—सबकी ओर ध्यान से देखा। वे हमें जिस तरह से देख रहे थे, हमारी आँखों की चमक और चेहरे की खुशियाँ गायब हो चुकी थीं। उनकी आँखें देखकर हम सभी भीतर तक दहल गए। सबका मुआयना कर लेने के बाद उन्होंने फिर एक बार दाईं ओर देखा, जहाँ मैं और रामनाथन एक ही बेंच से सटे हुए साथ खड़े थे। सहसा उनकी निगाह मेरी टोपी और रामनाथन की चोटी पर जाकर ठहर गई। 
उन्होंने मुझसे गरजकर पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’
‘‘सर, अबुल पकीर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम।’’
‘‘ठीक है, ठीक है!...और तुम्हारा?’’
‘‘सर, रामनाथन शास्त्री।’’
‘‘कलाम! अपना सारा सामान समेटो और पीछेवाली बेंच पर जाकर बैठो।’’ उन्होंने सख्ती से मुझे आदेश दिया।
‘‘लेकिन, सर...’’ उनकी घूरती तीखी आँखों के सामने इसके आगे बोलने की मेरी हिम्मत ही नहीं हुई। मैं खुद को बहुत अपमानित महसूस कर रहा था। मैं यह जान ही नहीं पा रहा था कि मेरा दोष क्या है!...और पूछने की हिम्मत थी नहीं। मैं बुझे मन से अपनी कॉपी-किताबें समेटने लगा और पीछेवाली बेंच पर जाकर बैठ गया। मेरे जैसी हालत रामनाथन की भी थी। वह बुरी तरह से रो पड़ा। उस वक्त उसका पूरा चेहरा आँसुओं से तर हो गया था, जिसे मैं आज तक नहीं भूल पाया हूँ। वह लगातार रोए जा रहा था। कक्षा के सभी बच्चे उदास थे। अब तक वे सब इन नए अध्यापक के व्यवहार से बुरी तरह से सहम चुके थे। हममें से सभी ने यह घटना अपने-अपने घर जाकर अपने परिवारवालों को बताई।
रामनाथन शास्त्री के पिता ने उसी दिन मुझसे और बाकी बच्चों से पूरी बात की जानकारी ली। मेरे पिताजी और फादर बोदल के साथ विचार-विमर्श किया और उसी शुक्रवार की अपनी बैठक में हमारे नए अध्यापक महोदय को भी आमंत्रित कर लिया। इस बार की उनकी वार्त्ता का विषय था—‘जात-पाँत को लेकर देश में बढ़ता भेदभाव’। 
शास्त्रीजी ने अपनी बात शुरू की, ‘‘इमाम साहब, आपने आज की खबर पढ़ी? अलग-अलग धर्मों के लोग किस तरह से आपस में लड़ रहे हैं, एक-दूसरे के खून के प्यासे बने हुए हैं!’’
‘‘आप सही कह रहे हैं, शास्त्रीजी! एक ओर तो पूरा देश आजादी के आंदोलनों को बुलंद कर रहा है और दूसरी ओर कुछ मूर्ख स्वार्थी लोग धर्म और मजहब के नाम पर एक-दूसरे की जान ले रहे हैं।’’ फादर ने चिंतित होते हुए कहा।
मेरे पिताजी ने भी अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘फादर, ये मजहबी लोग बहुत स्वार्थी हैं। अपने फायदे के लिए मासूम लोगों को धर्म के नाम पर मूर्ख बनाते हैं और आपस में ही लड़वाते हैं।’’ 
शास्त्रीजी ने उपाय सुझाया, ‘‘इससे बचने का एक तरीका है। यदि हम अपने बच्चों को धार्मिक भेदभाव करना न सिखाएँ और सभी संप्रदायों का सम्मान करना सिखाएँ तो यकीनन इस बुराई से बचा जा सकता है।’’
‘‘शास्त्रीजी, आप एकदम दुरुस्त फरमा रहे हैं। हम खुद प्रेम और एकता से रहें और यही अपने बच्चों को भी सिखाएँ तो आनेवाले समय में इस उन्माद से बचा जा सकता है।’’ पिताजी बोले।
‘‘शास्त्रीजी, मैं भी आपकी बात से सहमत हूँ। गॉड ने हम सबको एक सा बनाया है। सबके वही दो हाथ, दो पैर, दो आँखें, दो कान, एक नाक; लेकिन फिर भी न जाने किस बात पर लोग आपस में लड़ते हैं।’’ फादर ने भी शास्त्रीजी की बात का समर्थन किया।
‘‘फादर बोदल! अगर हमारे देश के अध्यापक भी अपनी जिम्मेदारी समझें और बच्चों को आपस में भेदभाव करना और लड़ना-झगड़ना न सिखाकर एकता, मानवता और प्रेम का पाठ का पढ़ाएँ तो भी इस समस्या से बहुत हद तक बचा जा सकता है।’’ शास्त्रीजी ने हमारे नए अध्यापक की ओर देखते हुए कहा।
‘‘हमें अपने बच्चों के दिमाग में न तो खुद नफरत के बीज बोने चाहिए और न ही किसी और को ऐसा करने का अधिकार देना चाहिए। आज हमारे बीच नए अध्यापक महोदय भी हैं।’’ फिर शास्त्रीजी हमारे नए शिक्षक की ओर मुखातिब होकर बोले, ‘‘आपका क्या विचार है, मास्टरजी? क्या आप अपने आपको ज्ञान और शिक्षा का स्रोत मानते हैं? क्या आप बच्चों को एकता की सीख देते हैं, ताकि देश की बुनियाद मजबूत बन सके?’’
हमारे अध्यापक महोदय अब तक यह सारा विचार-विमर्श ध्यान से सुन रहे थे। वे समझ गए कि आज उन्हें यहाँ क्यों बुलाया गया है और यह सब क्यों सुनाया जा रहा है। उन्होंने धीरे से सिर झुकाकर कहा—
‘‘मैं नहीं जानता था कि मेरे द्वारा दो बच्चों को कक्षा में अलग-अलग बैठा देने का परिणाम इतना गंभीर हो सकता है! मैं अपने बचपन से इसी भेदभाव को देखता और सीखता आया हूँ, इसलिए मैंने भी अपने उसी पूर्वग्रह का सहारा ले लिया। मैं भी उसी लीक पर चल पड़ा था। मुझे आज से पहले इस तरह से किसी ने भी नहीं सिखाया था कि भेदभाव हमारे समाज के लिए इतना खतरनाक भी साबित हो सकता है! आज मैं आप सभी से वायदा करता हूँ कि आइंदा कभी ऐसा नहीं होगा और जल्द-से-जल्द इस गलती को सुधार दिया जाएगा।’’
परिणाम यह हुआ कि अगले ही दिन कक्षा में इस गलती को सुधार दिया गया। मैं और रामनाथन शास्त्री फिर एक बेंच पर आ गए। 
इसी प्रकार से एक और घटना याद आ रही है। मेरे विज्ञान के शिक्षक शिव सुब्रह्मण्य अय्यर कट्टर सनातनी ब्राह्मण थे और उनकी पत्नी अत्यंत रूढि़वादी थीं। किंतु अब अय्यर सर रूढि़वाद के खिलाफ हो चले थे। वे चाहते थे कि विभिन्न धर्मों के लोग आपस में एक-दूसरे के साथ प्रेम से मिल-जुलकर रहें। वे मेरे साथ काफी समय व्यतीत किया करते थे। 
एक दिन मुझसे बोले, ‘‘कलाम, मैं तुम्हें ऐसा बुद्धिमान और प्रतिभावान बनाना चाहता हूँ कि तुम भविष्य में बड़े शहरों के लोगों के बीच एक उच्च शिक्षित व्यक्ति के रूप में पहचाने जाओ।’’ 
मैं उनसे बहुत स्नेह करता था और अकसर उनके घर पढ़ने चला जाता था। एक दिन उन्होंने मुझे अपने घर में भोजन करने के लिए कहा, ‘‘कलाम, आज तुम मेरे साथ ही भोजन कर लो, खाने का वक्त हो गया है। तुम भी तो भूखे होगे?’’ 
मैंने कोई उत्तर नहीं दिया, क्योंकि मुझे वाकई बहुत तेज भूख लग रही थी। मैंने गौर किया कि उनकी पत्नी बहुत परेशान नजर आ रही हैं। उन्होंने मास्टरजी को रसोई के भीतर आने दिया, किंतु मुझे दरवाजे पर ही भोजन की थाली पकड़ाते हुए बोलीं, ‘‘कलाम, तुम बाहर बैठकर खा लो। कुछ और भी लेना हो तो ले लेना बेटा।’’ 
अय्यर सर अपनी पत्नी के इस व्यवहार से जरा भी विचलित नहीं हुए, बल्कि वे भी अपनी भोजन की थाली लेकर बाहर मेरे पास आकर बैठ गए और मेरे साथ बातें कर-करके भोजन करने लगे। उनकी पत्नी दरवाजे की ओट से यह सब देखती रहीं। 
मैं अब बड़ा हो रहा था और धीरे-धीरे इस भेदभाव को समझने लगा था। मैं उस दिन बहुत आहत हुआ। रातभर बिस्तर पर लेटा सोचता रहा कि क्या मेरे खाने के तरीके में कोई भेद है? क्या मैं एक अलग तरह का प्राणी हूँ? क्या मेरे खाना खाने या खाकर उठने में कोई दोष है? यही सब सोचते-सोचते मैं सो गया। 
इसी के एक हफ्ते बाद अय्यर सर ने मुझे फिर अपने घर खाने पर आमंत्रित किया। मैं बहुत झिझक रहा था कि सर को न कैसे कहूँ! किंतु सर मेरी हिचकिचाहट को देखते हुए बोले, ‘‘इसमें परेशान होने की जरूरत नहीं है। एक बार जब तुम व्यवस्था बदल डालने का फैसला कर लेते हो तो ऐसी समस्याएँ सामने आती ही हैं। इनसे डरना नहीं चाहिए, कलाम। बार-बार कोशिश करनी चाहिए। सफलता मिलेगी, बेटे।’’ 
अगले हफ्ते जब मैं शिव सुब्रह्मण्य अय्यर सर के घर रात्रिभोज पर गया तो उनकी पत्नी स्वयं मुझे रसोई में ले गईं और अपने हाथों से मेरे लिए भोजन परोसा। 




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